ऑपरेशन कगार बंद किया जाए : लोकतान्त्रिक फ्रन्ट

जालंधर। रविवार (7 नवंबर) को यहां ऑपरेशन ग्रीन हंट विरोधी लोकतांत्रिक फ्रंट पंजाब की तरफ से प्रदर्शन कर आदिवासियों और माओवादी क्रांतिकारियों को फर्जी मुठभेड़ों में मारने की घटनाओं का विरोध किया गया और जेलों में बंद बुद्धिजीवियों, लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं और सजा पूरी कर चुके कैदियों की रिहाई की मांग की गई।

इससे पहले देशभक्त यादगार हॉल में फ्रंट के संयोजकों डॉ. परमिंदर सिंह, प्रोफेसर ए.के. मलेरी, यशपाल और बूटा सिंह महिमूदपुर की अध्यक्षता में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस को समर्पित प्रांतीय सम्मेलनआयोजित किया गया। इसमें पंजाब भर से किसान, मजदूर, युवा, विद्यार्थी, महिलाएं, तर्कशील, लोकतांत्रिक अधिकारों के झंडाबरदार, जनपक्षीय लेखक, साहित्यकार, कलाकार-रंगकर्मी पहुंचे।

सभा को संबोधित करते हुए प्रमुख कार्यकर्ता नदीम ख़ान, वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत राही, कार्यकर्ता आसिफ़ इक़बाल तन्हा और जानी-पहचानी लोकतांत्रिक शख्सियत व प्रसिद्ध नाटककार गुरशरण की बेटी डॉ. नवशरण ने कहा कि भारतीय राज्य द्वारा फर्जी मुठभेड़ों में लोगों को मारा जा रहा है, जेलबंदी और झूठे मामलों के जरिए लोकतांत्रिक व मानवाधिकारों का दमन किया जा रहा है।

केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा “आत्मसमर्पण करने या मरने के लिए तैयार रहने” जैसे बार-बार किए जाने वाले ऐलान गंभीर चिंता का विषय हैं।

सम्मेलन में कहा गया कि भारतीय शासकों द्वारा बस्तर और अन्य आदिवासी इलाकों में व्यापक अर्धसैनिक अभियानों का एकमात्र उद्देश्य देश के जल-जंगल-ज़मीन और खनिज भंडारों को विदेशी व देसी एकाधिकारवादी पूंजीपतियों के हवाले करके लुटाना है।

वक्ताओं ने कहा कि सरकार की अपने ही लोगों के खिलाफ कॉरपोरेट-हितैषी जंग और आरएसएस-भाजपा की सांप्रदायिक विभाजनकारी राजनीति का विरोध करने वाले जनपक्षीय बुद्धिजीवियों और लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमा चलाए जेलों में सड़ाया जा रहा है और अन्य लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं को भी जेलों में डालने की तैयारियां की जा रही हैं।

एडवोकेट सुरेंद्र गाडलिंग, कबीर कला मंच के कलाकारों, उमर ख़ालिद, गुलफ़िशां फ़ातिमा सहित दर्जनों लोकतांत्रिक लोग “शहरी नक्सली” और अन्य झूठे नैरेटिव के आधार पर जेलों में बंद हैं। अदालतों की उदासीनता के कारण पूरे देश में सजा पूरी कर चुके सैकड़ों कैदी जेलों में सड़ रहे हैं।

वक्ताओं ने समस्त जनपक्षीय बुद्धिजीवियों, लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं तथा पूरे देश में सजा पूरी कर चुके कैदियों की रिहाई के लिए मजबूत लोकतांत्रिक आंदोलन खड़ा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

सभा में जसविंदर फगवाड़ा द्वारा प्रस्ताव पेश किए गए जिन्हें हाथ खड़े करके पारित किया गया और मांग की गई कि आदिवासी क्षेत्रों में “ऑपरेशन कगार” सहित हर तरह के सैन्य अभियान बंद किए जाए। फर्जी मुठभेड़ों सहित हर तरह के दमन-ज़ुल्म को तुरंत रोका जाए। वहां से सभी पुलिस कैंप हटाए जाएं और पुलिस व अर्धसैनिक बल वापस बुलाए जाए। जल-जंगल-ज़मीन और खनिज भंडारों को कॉरपोरेटों को लुटाना बंद किया जाए और जन-विरोधी आर्थिक मॉडल रद्द किया जाए।

आदिवासियों के खिलाफ हमले बंद किए जाएं। मजदूर-विरोधी श्रम कोड, यूएपीए, अफ्सपा सहित सभी काले कानून रद्द किए जाएं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) भंग की जाए। दिल्ली हिंसा, भीमा-कोरेगांव आदि झूठे साज़िश केस बनाकर जेलों में बंद बुद्धिजीवियों और लोकतांत्रिक अधिकार कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए।

बिना मुकदमा चलाए वर्षों से जेलों में बंद कार्यकर्ताओं और सजा पूरी कर चुके सभी कैदियों को तुरंत रिहा किया जाए। निजीकरण बंद किया जाए और नौकरी से निलंबित किए गए रोडवेज़ कर्मचारियों को तुरंत बहाल किया जाए। लोगों के संघर्ष और संगठन बनाने के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार छीनने के लिए सरकारी हमले बंद किए जाएं।

(बूटा सिंह की रिपोर्ट)

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